पटना उच्च न्यायालय ने एक विभागीय जांच से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक समाचार पत्र में प्रकाशित असत्यापित समाचार रिपोर्ट को कथित कदाचार को स्थापित करने के लिए निर्णायक सबूत के रूप में नहीं माना जा सकता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विभागीय कार्यवाही में आरोपों को स्थापित करने के लिए उचित और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक है। केवल मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट पर भरोसा करने से किसी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप स्वत: स्थापित नहीं हो जाते।
अदालत ने यह भी कहा कि एक समाचार रिपोर्ट किसी घटना के बारे में जानकारी के स्रोत के रूप में काम कर सकती है। हालाँकि, यदि रिपोर्ट किए गए तथ्यों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया गया है और उनका समर्थन करने वाली कोई अन्य विश्वसनीय सामग्री नहीं है, तो केवल उस रिपोर्ट के आधार पर विभागीय अपराध का निर्धारण करना उचित नहीं होगा।
यह अवलोकन विभागीय पूछताछ में प्राकृतिक न्याय और साक्ष्य मानकों के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत का दृष्टिकोण बताता है कि किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले आरोपों की उचित जांच की जानी चाहिए और निष्कर्ष विश्वसनीय सबूतों पर आधारित होना चाहिए।
पटना उच्च न्यायालय का फैसला सरकारी कर्मचारियों और विभागीय जांच से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण है।




