नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) द्वारा देश भर में आवारा मवेशियों के लिए आश्रय स्थापित करने के निर्देशों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ गठित करने पर सहमत हो गया है। यह मामला राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवारा मवेशियों की मौजूदगी और सड़क-सुरक्षा जिम्मेदारियों से जुड़ा है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया। उन्होंने तर्क दिया कि पहले की एक विशेष पीठ ने एनएचएआई को देश भर में आवारा मवेशियों के लिए आश्रय स्थल स्थापित करने का निर्देश दिया था, जबकि एनएचएआई का कहना है कि जिम्मेदारी स्थानीय निकायों और जिला प्रशासन की होनी चाहिए।
एनएचएआई ने अदालत को यह भी बताया कि देश भर में ऐसे आश्रय स्थल स्थापित करने से महत्वपूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक बोझ पड़ेगा। रिपोर्टों के अनुसार, प्राधिकरण ने लगभग ₹7,000 करोड़ की लागत का अनुमान लगाया है और तर्क दिया है कि जिम्मेदारी को स्थानीय स्तर के प्रशासन के साथ समन्वित किया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि में मई 2026 में जारी किए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश शामिल हैं। अदालत ने राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों और एक्सप्रेसवे से आवारा मवेशियों को हटाने, संवेदनशील इलाकों की निगरानी बढ़ाने, जहां ऐसे जानवर अक्सर पाए जाते हैं, और पकड़े गए जानवरों के लिए उपयुक्त आश्रय, भोजन, पानी और पशु चिकित्सा देखभाल का प्रावधान करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि संबंधित अधिकारियों को संयुक्त रूप से उन राजमार्ग हिस्सों की पहचान करनी चाहिए जहां आवारा मवेशियों की समस्या बार-बार होती है और वहां तत्काल कार्रवाई करें। इसने राजमार्ग गश्ती टीमों और सड़क-सुरक्षा इकाइयों के माध्यम से निरंतर निगरानी पर जोर दिया था।
विशेष पीठ अब एनएचएआई की आपत्ति और पहले के निर्देशों से संबंधित कानूनी स्थिति पर सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि एनएचएआई को आश्रय स्थल स्थापित करने की जिम्मेदारी से मुक्त किया जाएगा या नहीं।



