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Editorial

मजबूरों को मजबूर करने का यह कैसा चलन?

चंद रुपयों का सौदा…. सस्ता सामान या हम? – अतुल मलिकराम (लेखक एवं राजनीतिक रणनीतिकार) द मीडिया टाइम्स  डेस्क : आजकल की दिखावे की दुनिया में यह देखना वाकई निराशाजनक…

Aug 1, 2024
3 min read
मजबूरों को मजबूर करने का यह कैसा चलन?

Photo: The Media Times / Representative Image

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चंद रुपयों का सौदा….

सस्ता सामान या हम?

– अतुल मलिकराम (लेखक एवं राजनीतिक रणनीतिकार)

द मीडिया टाइम्स 

डेस्क : आजकल की दिखावे की दुनिया में यह देखना वाकई निराशाजनक है कि मानव स्वभाव कितना उथला हो सकता है। हम अक्सर वास्तविक मायने रखने वाली चीजों के बजाए चमक-दमक वाली चीजों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। दिखावे का यह जुनून हमारे समाज की प्राथमिकताओं के बारे में बहुत कुछ कहता है। यह दर्शाता है कि हम अक्सर इस बात की ज्यादा परवाह करते हैं कि कोई चीज कैसी दिखाई देती है, बजाए इसके कि वह वास्तव में कैसी है और सबसे बड़ी बात, इसके गुण क्या हैं।

उदाहरण के लिए, खरीदारी को ही ले लीजिए। जब हम महँगे और आलीशान मॉल, होटल और शोरूम में जाते हैं, तो बिना सोचे-समझे ऐसी-ऐसी चीजें खरीद लेते हैं, जिनकी हमें वास्तव में जरुरत भी नहीं होती है। दरअसल, वहाँ का सारा का सारा सेटअप ही वस्तुओं के प्रति हमें लुभाने के अनुसार किया जाता है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि वहाँ हमें हाई-फाई कीमतों पर सामान मिलेगा, फिर भी हमारे मुँह पर वहाँ जाकर ताला लग जाता है। हम वहाँ की ऊँची-ऊँची कीमतों पर कोई सवाल नहीं उठाते और मौल-भाव का तो कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि हमारे मन में डर होता है और यह हमारी शर्मिंदगी का कारण बन सकता है, इसलिए हम बिना पलक झपकाए एक कप कॉफी पर 500 रुपए खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं। हाँ, बैचेनी बेशक मन को भीतर से कचोट रही होती है, लेकिन मजाल है कि इसकी झलक मात्र भी चेहरे पर दिख जाए।

लेकिन, वहीं जब हम सड़क विक्रेताओं से कोई सामान खरीदते हैं, तो यहाँ की कहानी और हमारी विचारधारा दोनों की नैया डूब जाती है। हम न सिर्फ सामान की गुणवत्ता और टिकाऊपन पर भर-भर कर सवाल उठाते हैं, बल्कि सामान अच्छा न निकलने पर उसे वापस कर देने की धमकी भी दे देते हैं, और मौल-भाव की तो क्या ही बात की जाए, वह तो हम उनसे ऐसे करते हैं, जैसे वो हमारा ही सामान सड़कों पर बेचने निकले हों.. हिचकिचाहट का तो यहाँ नामों-निशान ही नहीं होता है। लेकिन क्या ये वाकई जरूरी है? ट्रैफिक सिग्नल पर पेन बेचने वाले से, या सुबह सब्जी बेचने वाली महिला से, या बाजार के पास गुब्बारे बेचने वाले दादाजी से मोलभाव करके हम कितने पैसे बचा लेते हैं?

मोलभाव करके हम जो कुछ पैसे बचाते हैं, उससे शायद हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन कभी सोचना कि उन गरीबों के लिए यह कितना मायने रखता होगा। दो-पाँच रुपए के लिए झिक-झिक करते हुए हम यह भी नहीं सोचते कि ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ा वह फेरीवाला इस छोटे से काम के जरिए अपने परिवार के लिए चंद पैसे कमाने की कोशिश कर रहा है। वह सब्जीवाला इस काम से ही अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। गुब्बारे वाले दादाजी शायद अपने पोते-पोतियों को एक वक्त भर-पेट खाना खिलाने की कोशिश करते होंगे।

तकलीफ होती है यह सोचकर कि हम उन चीजों पर दिल खोलकर खर्च करने से नहीं हिचकिचाते, जिनकी हमें जरुरत भी नहीं है, लेकिन उन लोगों से कुछ पैसे बचाने की कोशिश करते हैं, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

 


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