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‘द बैड्स ऑफ बॉलीवुड’ के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करना हमारे न्याय क्षेत्र के बाहर

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में वेब सीरीज ‘द बैड्स ऑफ बॉलीवुड’ के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि…

Jan 29, 2026
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‘द बैड्स ऑफ बॉलीवुड’ के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करना हमारे न्याय क्षेत्र के बाहर

Photo: The Media Times / Representative Image

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में वेब सीरीज ‘द बैड्स ऑफ बॉलीवुड’ के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला उसके न्यायिक क्षेत्राधिकार (जूरिस्डिक्शन) के अंतर्गत नहीं आता, इसलिए इस पर सुनवाई करना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

यह याचिका एक सामाजिक संगठन द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वेब सीरीज में बॉलीवुड और उससे जुड़े कलाकारों की छवि को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि इस सीरीज में आपत्तिजनक और भ्रामक सामग्री दिखाई गई है, जिससे समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि जिस प्लेटफॉर्म पर यह वेब सीरीज प्रसारित हो रही है, उसका मुख्य कार्यालय और संचालन क्षेत्र दिल्ली से बाहर स्थित है। ऐसे में यह मामला तकनीकी रूप से दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह उचित न्यायालय में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराए।

अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में क्षेत्राधिकार का पालन करना बेहद जरूरी है। किसी भी मामले की सुनवाई तभी की जा सकती है, जब वह संबंधित न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता हो। नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करके कोई फैसला नहीं लिया जा सकता।

इस फैसले के बाद याचिकाकर्ता पक्ष को झटका लगा है। हालांकि, उनके वकील ने संकेत दिया है कि वे अब इस मामले को किसी अन्य सक्षम न्यायालय में ले जाने पर विचार करेंगे। उनका कहना है कि वेब सीरीज की सामग्री से समाज की भावनाएं आहत हुई हैं और इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई जरूरी है।

वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला डिजिटल कंटेंट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े मामलों में क्षेत्राधिकार की अहम भूमिका को दर्शाता है। आज के समय में जब वेब सीरीज और ओटीटी प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे मामलों में सही अदालत का चयन बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अदालतों का प्रयास रहता है कि कानून के दायरे में रहकर ही किसी विवाद का समाधान किया जाए।

दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले को भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया को और स्पष्टता मिलेगी

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