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WhatsApp ग्रुप TISS के प्रोफेसर को पड़ा महंगा, बॉम्बे हाई कोर्ट ने रद्द की अनिवार्य सेवानिवृत्ति

अदालत ने फैसला सुनाया कि संस्थागत अनुमति के बिना व्हाट्सएप ग्रुप बनाना अपने आप में इतनी कठोर सजा को उचित नहीं ठहरा सकता।

Sep 18, 2026
2 min read
WhatsApp Group Costs TISS Professor Dearly, Bombay High Court Quashes Compulsory Retirement

Photo: The Media Times / Representative Image

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The Media Times.Live News Desk
The Media Times

मुंबई, 18 सितंबर: बॉम्बे हाई कोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के प्रोफेसर डॉ. स्वपन गरेन को बड़ी राहत देते हुए उनके अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को रद्द कर दिया है। मामला संस्थान की अनुमति के बिना व्हाट्सएप ग्रुप बनाने से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि महज एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाना किसी कर्मचारी के लंबे और सफल करियर को खत्म करने का आधार नहीं हो सकता.

जस्टिस एम.एस. कार्णिक और जस्टिस संदीप डी. पाटिल की पीठ ने 16 सितंबर को दिए अपने फैसले में TISS द्वारा की गई कार्रवाई को असंगत करार दिया. कोर्ट के मुताबिक प्रोफेसर पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने 'TISSians Career Impact2' नाम से एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया था. संस्थान ने आरोप लगाया था कि समूह का उपयोग समानांतर प्लेसमेंट सेवा चलाने के लिए किया जा रहा था और संस्थान के लोगो का भी उपयोग किया जा रहा था।

व्हाट्सएप चैट की समीक्षा करने के बाद, अदालत ने कहा कि समूह का उपयोग मुख्य रूप से नौकरियों और करियर से संबंधित जानकारी साझा करने के लिए किया जा रहा था। अदालत को इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं मिले कि प्रोफेसर को गतिविधि से व्यक्तिगत वित्तीय लाभ हुआ था। अदालत ने यह भी कहा कि संस्थान से पूर्व अनुमति प्राप्त करने में विफलता, अपने आप में इतनी कड़ी सजा को उचित नहीं ठहरा सकती।

पीठ ने जांच अधिकारी के निष्कर्षों को भी खारिज कर दिया, उन्हें गलत और रिकॉर्ड के अनुसार नहीं बताया। फैसले में अंग्रेजी न्यायाधीश लॉर्ड डिप्लॉक की एक प्रसिद्ध कहावत का जिक्र किया गया, जिसमें कहा गया था कि ''आप अखरोट को तोड़ने के लिए स्लेजहैमर का उपयोग नहीं कर सकते।''

उच्च न्यायालय ने प्रोफेसर के निलंबन और अनिवार्य सेवानिवृत्ति से संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि उन्हें सेवा की निरंतरता के साथ पिछली मजदूरी का 50 प्रतिशत दिया जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि उनके सेवानिवृत्ति लाभों की पुनर्गणना की जाए और तीन महीने के भीतर बकाया राशि का भुगतान किया जाए।

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