मेलबर्न: ऑस्ट्रेलिया का ऊर्जा क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है। ग्रैटन इंस्टीट्यूट के टोनी वुड के अनुसार, हाल के आंकड़े संकेत देते हैं कि देश का लंबे समय से चल रहा और जटिल ऊर्जा परिवर्तन अब ठोस परिणाम देने लगा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि पिछले तिमाही में ऑस्ट्रेलिया के मुख्य बिजली ग्रिड में पहली बार नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण स्रोतों का योगदान कुल आपूर्ति का 50 प्रतिशत से अधिक रहा।
टोनी वुड लिखते हैं कि यदि पिछले सप्ताह जैसी भीषण गर्मी की लहर दस साल पहले ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर आई होती, तो बिजली व्यवस्था के चरमरा जाने की पूरी आशंका थी। उस समय पारंपरिक बिजली संयंत्रों पर अत्यधिक दबाव पड़ता और बड़े पैमाने पर ब्लैकआउट हो सकते थे। लेकिन इस बार, कुछ स्थानीय बाधाओं के बावजूद, बिजली प्रणाली ने अपेक्षाकृत स्थिर प्रदर्शन किया और मांग को काफी हद तक पूरा किया।
नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते उपयोग का एक और अहम असर बिजली की कीमतों पर देखने को मिला है। रिपोर्ट के अनुसार, थोक बिजली कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में 40 प्रतिशत से अधिक कम रही हैं। यह गिरावट न केवल उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सौर, पवन और बैटरी भंडारण जैसी तकनीकें अब प्रणाली की लागत को कम करने में प्रभावी भूमिका निभा रही हैं।
ग्रैटन इंस्टीट्यूट के हालिया शोध में कहा गया है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहते हैं और किसी बड़े नीतिगत या तकनीकी संकट से बचा जा सके, तो वर्ष 2026 के मध्य तक उपभोक्ताओं को खुदरा बिजली बिलों में भी स्पष्ट कमी देखने को मिल सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि यह सफलता स्वतःसिद्ध नहीं है। इसके लिए ग्रिड को और मजबूत बनाने, ट्रांसमिशन नेटवर्क के विस्तार और ऊर्जा भंडारण में निरंतर निवेश की आवश्यकता होगी।
ऑस्ट्रेलिया की ऊर्जा परिवर्तन यात्रा आसान नहीं रही है। राजनीतिक बहस, नीतिगत अस्थिरता और तकनीकी चुनौतियों ने इस प्रक्रिया को जटिल बनाया। इसके बावजूद, हालिया आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।
कुल मिलाकर, बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा हिस्सेदारी और घटती थोक कीमतें यह सवाल उठाती हैं कि क्या ऊर्जा परिवर्तन वास्तव में सफल हो रहा है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, इसका उत्तर धीरे-धीरे ‘हाँ’ की ओर झुकता दिखाई दे रहा है।


